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Friday, August 7, 2026

सुदामा की कृष्ण भक्ति और अपने मित्र के प्रति प्रेम की पराकाष्ठा : डा.शत्रुघ्न त्रिपाठी

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वाराणसी. 19 अगस्त.(रमेश शर्मा)

आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर रुइया संस्कृत छात्रावास , काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी मे इस पर्व के अवसर पर जिवंत झाकियों से कृष्ण लीला का भव्य चित्रण किया गया. विद्यालय परिसर मे प्रमुख ज्योतिषाचार्य डा.शत्रुघ्न त्रिपाठी ने सभी कलाकारों के प्रदर्शन की सराहना की.

उन्हों डा.शत्रुघ्न त्रिपाठी ने इस अवसर पर सुदामा की कृष्ण भक्ति और अपने मित्र के प्रति प्रेम की पराकाष्ठा का विस्तृत वर्णन किया.
उन्होंने बताया कि भारतीय समाज में जब भी मित्रता का उदाहरण प्रस्तुत किया जाता है तब श्री कृष्ण और सुदामा की मित्रता को सर्वोपरि माना जाता है। यह सभी जानते हैंं कि श्री कृष्ण द्वारिकाधीश और सुदामा एक गरीब ब्राह्मण थे। लेकिन सुदामा का कृष्ण के प्रति भक्ति और कृष्ण का सुदामा के प्रति अनुराग नर—नारायण के एकाकार होने का ही उदाहरण है।


कहा जाता है कि धर्म परायण सुदामा एक दिन में केवल पांच घरों में भिक्षा मांगते थे और इसी भिक्षा से उनके जीवन का निर्वाह होता था। एक दिन जब उन्हें एक ही घर से भिक्षा मिली तब उनकी पत्नी ने भिक्षा में मिले अन्न को बच्चों को खिला दिया और पति—पत्नी के लिए कुछ न रहा। जब सुदामा ने देखा कि आज भोजन नहीं है और उसने ठाकुर जी को भोग नहीं लगाया है तब वह दुखी हो गए। लेकिन अन्न के पात्र में एक दाना चावल (भात) बचा रह गया था। सुदामा उस भात का दो टुकड़ा करते हैं और एक टुकड़ा अपनी पत्नी को तथा दूसरा ठाकुर जी को समर्पित करने लगते हैं। इसे देख पत्नी भी अपने हिस्से का भात का टुकड़ा ठाकुर जी को समर्पित कर देती हैं।
समय बीतता और पत्नी के कहने पर एक पोटली में तीन मुठ्ठी चावल लेकर सुदामा श्रीकृष्ण से मिलने द्वारिका चले जाते हैं। जब द्वारिका में श्रीकृष्ण आंसुओं से सुदामा का चरण धोकर उनकी आवभगत करते हैं तब वह पोटली के संबंध में उनसे पूछते है। बाद में श्रीकृष्ण सुदामा के हाथ से पोटली ले लेते हैं और उसमें रखे चावल को खाने लगते हैं।
कथा के अनुसार श्रीकृष्ण जब पहली मुठ्ठी चावल खाते हैं तब वह सुदामा को स्वर्ग का वैभव दे देते हैं। दूसरी मुठ्ठी में वह पृथ्वी लोक का वैभव दान कर देते हैं, और जब तीसरी मु्ठ्ठी खाने की कोशिश करते हैं तब रुक्मिणी उन्हें रोक लेती हैं और कहती हैं क्या अब अपना बैकुंठ लोक भी दे देंगे।
तब श्री कृष्ण कहते हैं — नियमत: तो यही करना करना चाहिए। क्योंकि सुदामा ने जब मुझे भात के दो टुकड़े अर्पण किए थे तब उनकी कुल संपत्ति वह भात के तुकड़े ही थे। उसने उस दिन अपनी पूरी संपत्ति मुझे अर्पण किया था। आज मेरी बारी है मुझे भी अपनी पूरी संपत्ति उसे देना चाहिए। मित्रता तो यही है कि सुदामा, कृष्ण बन जाए और कृष्ण, सुदामा बन जाए।
आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी है। भगवान श्रीकृष्ण को स्वयं को समर्पित कर दीजिए। जो जग के पालनहार हैं वह अपने बच्चों के दुखों जरूर दूर करेंगे।

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