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Tuesday, June 23, 2026

श्यामा प्रसाद की विलक्षण प्रतिभा प्रेरणा दाई :-गोमती साय

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पुण्य तिथि पर सांसद ने किया पुण्य स्मरण

रायगढ़ :- श्यामा प्रसाद मुखर्जी की पुण्यतिथि पर उनके अविस्मरणीय योगदान का स्मरण करते हुए क्षेत्र की सांसद गोमती साय ने कहा जुलाई, 1901 को संभ्रांत परिवार में जन्मे डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी को महानता के सभी गुण विरासत में मिले थे। पिता आशुतोष बाबू उस दौर के जमाने प्रसिद्ध शिक्षाविद् थे। डॉ. मुखर्जी ने 22 वर्ष की आयु में एमए की परीक्षा उत्तीर्ण की । 24 वर्ष की आयु में कोलकाता विश्वविद्यालय सीनेट के सदस्य बने। अध्ययन के लिए वे विदेश भी गए तथा वहां पर लंदन मैथेमेटिकल सोसायटी ने उनको सम्मानित सदस्य बनाया। विदेश से शिक्षा ग्रहण करने के बाद डॉ. मुखर्जी ने वकालत करने के बाद विश्वविद्यालय की सेवा में कार्यरत हो गए। सांसद गोमती ने बताया कि डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने 1939 से सक्रिय राजनीति में भाग लिया और आजीवन इसी में लगे रहे। गांधीजी की बहुत सी नीतियों का मुखर विरोध करने वाले मुखर्जी ने कहा स्पष्ट तौर पर कहा था वह दिन दूर नहीं जब गांधीजी की अहिंसावादी नीति के अंधानुसरण के फलस्वरूप समूचा बंगाल पाकिस्तान का अधिकार क्षेत्र बन जाएगा।’ उन्होंने नेहरूजी और गांधीजी की तुष्टिकरण की नीति का सदैव खुलकर विरोध किया। आज उनके विचार प्रासंगिक है। अगस्त 1947 को स्वतंत्र भारत के प्रथम मंत्रिमंडल में एक गैर-कांग्रेसी मंत्री के रूप में उन्होंने वित्त मंत्रालय का काम संभाला। डॉ. मुखर्जी ने चितरंजन में रेल इंजन का कारखाना, विशाखापट्टनम में जहाज बनाने का कारखाना एवं बिहार में खाद का कारखाने स्थापित करवाए। हैदराबाद निजाम को भारत में विलीन करने में भी उनका सराहनीय योगदान रहा। 1950 के दौर में भारत की दयनीय दशा देख डॉ. मुखर्जी के मन को गहरा आघात लगा। उन्होंने भारत सरकार की अहिंसावादी नीति के फलस्वरूप मंत्रिमंडल से त्यागपत्र देकर संसद में विपक्ष की भूमिका का निर्वहन करने लगे। एक ही देश में दो झंडे और दो निशान का भी उन्होंने खुलकर विरोध किया। कश्मीर का भारत में विलय के लिए डॉ. मुखर्जी ने प्रयत्न प्रारंभ कर दिए। इसके लिए जम्मू की प्रजा परिषद पार्टी के साथ मिलकर उन्होंने आंदोलन छेड़ दिया। तत्कालीन विदेश मंत्री अटलबिहारी वाजपेयी वैद्य गुरुदत्त, डॉ. बर्मन और टेकचंद आदि को लेकर 8 मई 1953 को जम्मू के लिए कूच किया। सीमा प्रवेश के बाद उनको जम्मू-कश्मीर सरकार द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया। 40 दिन तक डॉ. मुखर्जी जेल में बंद रहे और 23 जून 1953 को जेल में उनकी रहस्यमय ढंग से मृत्यु हो गई। हमारी भारतीय संस्कृति के नक्षत्र अखिल भारतीय जनसंघ के संस्थापक तथा राजनीति व शिक्षा के क्षेत्र में सुविख्यात डॉ. मुखर्जी की 23 जून, 1953 को मृत्यु की घोषणा की गईं। बंगभूमि से पैदा डॉ. मुखर्जी ने अपनी प्रतिभा से समाज को चमत्कृत कर दिया था। बंगाल ने कितने ही क्रांतिकारियों को जन्म दिया है, उनमें से एक महान क्रांतिकारी डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी थे।

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