कैलाशपति धाम शिव मंदिर परिसर में आयोजित शिव महापुराण कथा सुनने पहुंचे पूर्व विधायक विजय अग्रवाल

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पंडित श्री मोहन कृष्ण तिवारी के मुखारबिंद से बह रही है शिव पुराण की भक्ति धारा

रायगढ़।    शहर के विनोबा नगर स्थित बैद्यनाथ मोदी नगर हाऊसिंग बोर्ड काॅलोनी कैलाशपति धाम शिव मंदिर परिसर में चल रहे शिव महापुराण कथा सुनने भक्तों की भीड़ उमड़ रही है। कथा श्रवण करने पहुचें रायगढ़ के पूर्व विधायक विजय अग्रवाल का कॉलोनी निवासियों द्वारा  स्वागत अभिनंदन किया गया उन्होंने कथा वाचक ब्यासपीठ पर विराजमान पंडित मोहन कृष्ण तिवारी जी से आर्शीवाद प्राप्त किये वही शिव मंदिर में भगवान श्री शिव शंकर जी का पूजा-अर्चाना कर आम जन की सुख-समृद्धि एवं खुशहाली के लिए कामना की।

      पंडित मोहन कृष्ण तिवारी के मुखारबिंद से शिव भक्त कथा का श्रवण कर रहे हैं। कथा के दौरान संगीतमय भजनों का भरपूर आनंद लेते हुए श्रोता भक्तों को जमकर झुमते हुए भी देखा जा रहा है उन्होंने कहा कि शिव महापुराण की महिमा है कि जो एक बार शिव महापुराण सुन लेता है उसे यम लोक की यत्रों से मुक्ती मिल जाती है।

      आगे महाराज मोहन कृष्ण तिवारी ने शिव महापुराण की महिमा बताई। शिव पुराण में शिव कल्याणकारी स्वरूप का तात्विक विवेचन, रहस्य महिमा और उपासना का विस्तृत वर्णन कर बताया शिव जो स्वयंभू हैं, शाश्वत हैं, सर्वोच्च सत्ता हैं और विश्व चैतना हैं ब्रम्हाण्डीय अस्तिव के आधार हैं। सभी पुराण में शिव पुराण को महत्वपूर्ण होने का दर्जा प्राप्त है। इसमें भगवान शिव के विविध रूपों, अवतारों, ज्योतिलिंगों, भक्तों और भक्ति का विशद वर्णन किया गया है।
कथावाचक पंडित मोहन कृष्ण तिवारी ने बताया कि हिंदू पौराणिक ग्रन्थों में शिवपुराण एक सुप्रसिद्ध पुराण हैं जिसमे भगवान् शिव के विभिन्न कल्याणकारी स्वरूपों, भगवान शिव की महिमा, शिव-पार्वती विवाह, कार्तिकेय जन्म और शिव उपासना का विस्तृत में वर्णन किया गया है। उन्होंने शिव पुराण के जालंधर का प्रसंग सुनाया।

शिव पुराण के श्री रुद्र संहिता पंचम खंड-चौहदवें अध्याय में वर्णित है कि जब देवराज इंद्र और बृहस्पति जी शिव से मिलने इंद्रपुरी से कैलाश आए तो वहां मनमाफिक सम्मान न मिलने पर इंद्र ने रुष्ट होकर भगवान शंकर का अपमान कर दिया। इससे क्रोधित भगवान शंकर तांडव की मुद्रा में आ गए। भयभीत इंद्र छिप गए और देवलोक में खलबली मच गई। भगवान शंकर के तीसरे नेत्र से अग्नि प्रकट हुई। इसी कोपाग्नि से एक बालक ने जन्म लिया। उस समय सागर की लहरों में तूफान जैसी स्थिति थी। इन्ही लहरों पर उस बालक को आश्रय मिला। यही बालक बड़ा होकर क्रूर, दंभी और अथाहशक्ति के स्वामी दैत्यराज जालंधर के नाम से विख्यात हुआ।

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