घरघोड़ा जनपद पंचायत में सूचना के अधिकार पर सवाल भ्रामक जानकारी देकर क्या छुपाया जा रहा है सच?

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रायगढ़ / जिले के घरघोड़ा जनपद पंचायत एक बार फिर सवालों के घेरे में है। आवेदक प्रताप नारायण बेहरा द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत जनपद पंचायत घरघोड़ा की आवास शाखा से वर्ष 2023-24 एवं 2024-25 में कार्यालयीन व्यय हेतु आवंटित राशि और वास्तविक खर्च का ब्योरा मांगा गया था।
लेकिन आरोप है कि मुख्य कार्यपालन अधिकारी द्वारा दी गई जानकारी न केवल अपूर्ण और भ्रामक है, बल्कि निर्धारित समय-सीमा के बाद उपलब्ध कराई गई। इतना ही नहीं, विलंब के बावजूद आवेदक से सूचना शुल्क भी वसूला गया, जो सीधे तौर पर सूचना के अधिकार कानून की भावना के विपरीत माना जा रहा है।

आखिर क्या था मामला
दिनांक 09/01/2026 को जनपद पंचायत घरघोड़ा में सूचना अधिकार अधिनियम 2005के तहत एक आवेदन प्रस्तुत की जाती हे जिसका तीस दिनों तक कोई जवाब नहीं मिलने की स्थिति में आवेदक द्वारा 09 /02/2026 को आवेदक द्वारा प्रथम अपील की गई जिसके बाद अधिकारी द्वारा आवक जावक में दिनांक 03/02/2026 को पत्र जारी किया जाता हैं और फर्जी ढंग से उस पत्र को 09/02/2026 को पोस्ट किया जाता है तथा पत्र में भी भ्रामक जानकारी दिया जाता है सूचना अधिकार अधिनियम 2009 नियम 3 का हवाला देते हुए कहा जाता है कि वित्तीय वर्ष एक विषय वस्तु है दो अलग अलग वर्षों की जानकारी के लिए दो आवेदन प्रस्तुत करें इसके बाद भी आवेदक द्वारा शुल्क देकर एक वर्ष की ही जानकारी ली जाती है तो वह जानकारी भी विषय से हटकर जानकारी दिया जाता है ऐसे में क्या अधिकारी द्वारा किसी बड़े भ्रष्टाचार को छुपाने का प्रयास किया जा रहा है

क्या कहता है कानून?

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के तहत 30 दिनों के भीतर सूचना उपलब्ध कराना अनिवार्य है। यदि तय समय सीमा में सूचना नहीं दी जाती, तो जानकारी निशुल्क उपलब्ध कराई जानी चाहिए। ऐसे में विलंब के बाद शुल्क लेना स्वयं में नियमों के उल्लंघन की श्रेणी में आ सकता है।
उठ रहे हैं गंभीर सवाल
आवास शाखा में आखिर कितना बजट स्वीकृत हुआ?
कितनी राशि वास्तविक रूप से खर्च की गई?
यदि जानकारी स्पष्ट है तो अधूरी व अपुष्ट जानकारी क्यों दी गई?
क्या दस्तावेजों में गड़बड़ी है या फिर कुछ छुपाने का प्रयास किया जा रहा है?
सूत्रों का कहना है कि यदि आवंटन और व्यय का स्पष्ट हिसाब सार्वजनिक हो जाए तो कई अनियमितताओं का खुलासा हो सकता है। यही कारण है कि अधूरी जानकारी देकर मामले को टालने की कोशिश की जा रही है।
भ्रष्टाचार की आशंका से इनकार कैसे?
जब एक सामान्य वित्तीय जानकारी भी पारदर्शी तरीके से उपलब्ध नहीं कराई जाती, तो स्वाभाविक रूप से संदेह पैदा होता है। कार्यालयीन व्यय जैसे मद में अक्सर स्टेशनरी, यात्रा, मरम्मत, संचालन आदि के नाम पर व्यय दिखाना चाहिए परन्तु जिम्मेदारों ने इसे न दिखाकर भ्रामक जानकारी बताया गया । यदि इसका स्पष्ट लेखा-जोखा सामने नहीं आता, तो सवाल उठना लाजमी है।
आगे क्या?
यदि संतोषजनक जानकारी उपलब्ध नहीं कराई जाती है तो आवेदक प्रथम अपील और आवश्यकता पड़ने पर राज्य सूचना आयोग में द्वितीय अपील का विकल्प अपना सकते हैं। इससे न केवल पारदर्शिता सुनिश्चित होगी बल्कि जवाबदेही भी तय होगी।
अब बड़ा सवाल यह है कि क्या मुख्य कार्यपालन अधिकारी घरघोड़ा पारदर्शिता के साथ पूरी जानकारी सार्वजनिक करेंगे या फिर मामला और गहराएगा?
जनता जानना चाहती है — आवास शाखा के नाम पर खर्च हुई राशि का सच आखिर क्या है?

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