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Friday, February 6, 2026

अनावश्यक संग्रह जीवन सफर को कठिन बनाता है:- बाबा प्रियदर्शी

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रायगढ़ :- जरूरत से ज्यादा संग्रह की मानसिकता जीवन सफर को अत्यधिक कष्ट प्रद बनाती है अति संग्रह की मानसिकता से जीवन यात्रा कठिन हो जाती है उक्त बातें बाबा प्रियदर्शी राम जी ने प्रदेश की राजधानी में राधे श्याम सुनील लेंध्रा के निवास स्थान पर उपस्थित लोगो एवम परिवार जनों के मध्य कहीं । जैसी संगत वैसी रंगत का उल्लेख करते हुए अघोर गुरु पीठ ट्रस्ट बनोरा के संस्थापक बाबा प्रियदर्शी राम जी ने कहा जीवन में हर व्यक्ति को संगति का विशेष ध्यान रखना चाहिए।वर्षा की बूंदे गंगा में गिरे तो जल पूजनीय होकर आचमन के योग्य हो जाता है वही जल नाली में गिरता है तो अपवित्र हो जाता है। उसी तरह

 हवा यदि हवा फूलों को स्पर्श करते हुए बहे तो आस पास का वातावरण महक उठता है लेकिन यही हवा मृत पशु से होकर गुजरे तो यही हवा दुर्गध उत्पन्न करती है। मुर्दे पर चढ़ा हुआ कपड़ा कफन बनकर अछूत माना जाता है वही भगवान पर चढ़े हुए वस्त्र पीतांबर बन जाता है जिसे पाने की होड़ लग रहती है। बाबा प्रियदर्शी राम ने मनुष्य जीवन को महान बताते हुए कहा मानव जीवन चौरासी लाख योनियों के पुण्य प्रताप का परिणाम है, मोह माया के जाल में फंसकर मानव जीवन को व्यर्थ में नही गंवाना चाहिए। भाग्य जानने की बढ़ती रुचि को समाज के लिए चिंता जनक एवम घातक बताते हुए कहा पूज्य पाद प्रियदर्शी ने कहा भगवान ने हर मनुष्य को अपना अपना भाग्य लिखने का सामर्थ्य दिया है वह कैसा भाग्य लिखता यह उसके ऊपर निर्भर करता है। जैसा कर्म वैसा फल कर्म के इस सिद्धांत के तहत जब मनुष्य के साथ कुछ बुरा घटित होता है तब वह बुरे परिणाम को पूजा पाठ के जरिए टालना चाहता है। हर मनुष्य को ईश्वर की आराधना आत्म साक्षात्कार के लिए नियमित करनी चाहिए। पूजा पाठ मंदिर कर्म के परिणाम को नही टाल सकते बल्कि नियमित पूजा पाठ ईश्वर की आराधना मनुष्य को विपरित परिस्थितियों में लड़ने का साहस प्रदान करती है। जीवन का सत्य मृत्यु को बताते हुए बाबा प्रियदर्शी राम जी ने कहा हर मनुष्य अपने जीवन के अंतिम सत्य मृत्यु की ओर बढ़ रहा है। जीवन के इस सफर को पूरा करने के दौरान मेहनत के बाद भी लक्ष्य हासिल नही होता तो अगले जीवन में उसका लाभ अवश्य मिलता है। मृत्यु का निश्चित समय जानने के बाद भयवश व्यक्ति सद्कर्म की ओर प्रेरित होता है एक दृष्टांत के जरिए समझाते हुए कहा मृत्यु भय नही बल्कि मोक्ष का द्वार है। शमशान में मृत्यु का स्मरण होता है यही से जीवन में वैराग्य भाव पैदा होता है। जीवन जीते हुए मोह माया से दूर रहने की आवश्यकता भी उन्होंने जताई।साधु संतो के जरिए बताई गई सनातन संस्कृति को जीवन का हिस्सा बनाए जाने का उपदेश देते हुए पीठाधीश्वर ने जीवन में आष्टांग योग अपनाए जाने के महत्त्व को भी रेखांकित किया। सत्य की शक्ति का प्रभाव बताने बाबा प्रियदर्शी ने राजा हरिश्चंद्र से जुड़े कथानक का जिक्र भी किया राजा हरिश्चंद्र को राजा से रंक बनना पड़ा लेकिन उनके सत्य की वजह से भगवान को अंततः दर्शन देना ही पड़ा।

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